एकांत में कहीं जी भरकर रोना चाहता हैमां की गोद में सर रखकर सोना चाहता है
मगर रोता है `वो´ तो रोती है मां भी
शायद इसी बात से घबराता है `वो´ भी
घुटन ही घुटन भरी है उसके शून्य से मन में
जैसे एक ही राग हो किसी बियावान से वन में
सब कहते हैं कि बहुत सुलझा हुआ है `वो´
मगर अपनी ही राहों में उलझा हुआ है `वो´
सुकून की तलाश में निकला है, जमीं के तारों की छांव में
आवाजों के बाजारों से होता हुआ पहुंचा है खामोशी के गांव में
चुप ही की तलाश में हरदम रहता है मौन सा
सोचता है इस डगर पर साथी मिल जाए कौन सा
अक्सर कहते हैं लोग कि `सनकी´ है `वो´
लगता है करता सिर्फ मन की है `वो´
जिंदगी की लहर में, बेखबर नदी सा बहना चाहता है
उम्मीदों की सहर में, इतना ही सबको कहना चाहता है
इक लड़का है `वो´
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