Sunday, 30 November 2008

दो नैना

मयूरी त्यागी
दूर खड़े वो नैना, जागें पूरी रैना,
थके-थके से, झुके-झुके से, लुटे-लुटे से,
किसी की तलाश में, किसी के अहसास में,
दूर खड़े वो नैना, जागे पूरी रैना,
थोड़े-थोड़े शरमाते, थोड़े-थोड़े इतराते,
कभी नखरे दिखाते, कभी आंसू छलकाते, गमी में भी मुस्कुराते,
दूर खड़े वो नैना, जागे पूरी रैना

Friday, 21 November 2008

कौन हूं मैं

मयूरी त्यागी...

मैं ना जानूं कौन हूं मैं, फिर भी हरदम मौन हूं मैं,
मैंने दिल से सिर्फ प्यार मांगा, हर बार ही मिला उससे धोखा
खुद से बातें करती चलती रही मैं, सवाल आया-किसी ने क्यों नहीं रोका,
कुछ धुंधले चेहरों को भूल रही हूं, बचपन की यादों में झूल रही हूं,
मैं ना जानूं कौन हूं मैं, फिर भी हरदम मौन हूं मैं,
जीवन में आया था प्यार का एक सैलाब, अकस्मात् बंद हो गई इक अधूरी सी किताब,
अब दोस्ती से ही जिंदा हूं मैं बिसरी यादों का इक पुलिंदा हूं मैं,
दोस्त की आंख का नीर अब मेरी आंख से बहे,
इस निमोही-जालिम जमाने को मयूरी यही बात कहे,
मैं ना जानूं कौन हूं मैं, फिर भी हरदम मौन हूं मैं,
सपनों के पंख फैलाकर आसमां में आशियां बनाना चाहती हूं,
मंजिल और दूरी का अदना सा ये फासला मिटाना चाहती हूं,
मंजिल की चाह में मेरा मन अकेला ही खड़ा है,
दुनिया की भीड़ में खुद को मनाने पे अड़ा है,
मैं ना जानूं कौन हूं मैं, फिर भी हरदम मौन हूं मैं,
आजकल एक शख्स की तलाश में हूं मैं,
ढूंढ़ती हो जिंदगी को, इक ऐसी लाश हूं मैं