दूर खड़े वो नैना, जागे पूरी रैना,
Sunday, 30 November 2008
दो नैना
दूर खड़े वो नैना, जागे पूरी रैना,
Friday, 21 November 2008
कौन हूं मैं
मयूरी त्यागी...मैं ना जानूं कौन हूं मैं, फिर भी हरदम मौन हूं मैं,
मैंने दिल से सिर्फ प्यार मांगा, हर बार ही मिला उससे धोखा
खुद से बातें करती चलती रही मैं, सवाल आया-किसी ने क्यों नहीं रोका,
कुछ धुंधले चेहरों को भूल रही हूं, बचपन की यादों में झूल रही हूं,
मैं ना जानूं कौन हूं मैं, फिर भी हरदम मौन हूं मैं,
जीवन में आया था प्यार का एक सैलाब, अकस्मात् बंद हो गई इक अधूरी सी किताब,
अब दोस्ती से ही जिंदा हूं मैं बिसरी यादों का इक पुलिंदा हूं मैं,
दोस्त की आंख का नीर अब मेरी आंख से बहे,
इस निमोही-जालिम जमाने को मयूरी यही बात कहे,
मैं ना जानूं कौन हूं मैं, फिर भी हरदम मौन हूं मैं,
सपनों के पंख फैलाकर आसमां में आशियां बनाना चाहती हूं,
मंजिल और दूरी का अदना सा ये फासला मिटाना चाहती हूं,
मंजिल की चाह में मेरा मन अकेला ही खड़ा है,
दुनिया की भीड़ में खुद को मनाने पे अड़ा है,
मैं ना जानूं कौन हूं मैं, फिर भी हरदम मौन हूं मैं,
आजकल एक शख्स की तलाश में हूं मैं,
ढूंढ़ती हो जिंदगी को, इक ऐसी लाश हूं मैं
Friday, 26 September 2008
मेरी मां...
दिनभर दौड़े-भागे, चौका-चूल्हा संभाले,पसीने से तर नजर आती मेरी मां
मेरी सलीके से भरी आवारगी पर,
सबकुछ जान कर भी मुस्कराती मेरी मां
जलता हूं जब भी अपनेआप में,
मेरे आंसू अपनी आंखों से बहाती मेरी मां
किताबों में जहां, कहां दिखता है,
अनुभव के चश्मे से दुनिया दिखाती मेरी मां
अंगुली पकड़कर चलना सीखा था वालिद की,
समाज के साथ चलना सिखाती मेरी मां
सीखता रहूं ताउम्र उन्हीं से मैं,
मेरे जीने का आखिरी बहाना मेरी मां
इक लड़का है `वो´
एकांत में कहीं जी भरकर रोना चाहता हैमां की गोद में सर रखकर सोना चाहता है
मगर रोता है `वो´ तो रोती है मां भी
शायद इसी बात से घबराता है `वो´ भी
घुटन ही घुटन भरी है उसके शून्य से मन में
जैसे एक ही राग हो किसी बियावान से वन में
सब कहते हैं कि बहुत सुलझा हुआ है `वो´
मगर अपनी ही राहों में उलझा हुआ है `वो´
सुकून की तलाश में निकला है, जमीं के तारों की छांव में
आवाजों के बाजारों से होता हुआ पहुंचा है खामोशी के गांव में
चुप ही की तलाश में हरदम रहता है मौन सा
सोचता है इस डगर पर साथी मिल जाए कौन सा
अक्सर कहते हैं लोग कि `सनकी´ है `वो´
लगता है करता सिर्फ मन की है `वो´
जिंदगी की लहर में, बेखबर नदी सा बहना चाहता है
उम्मीदों की सहर में, इतना ही सबको कहना चाहता है
इक लड़का है `वो´
सहाफी
सहाफियों का भी है अपना मुक्कमल जहां,सोच
छोटी सी सोच ने एक सनक सी पैदा की हैएक परिन्दा
एक परिन्दा उड़ रहा है,...कोई...
मालूम नहीं दिल बेचैन क्यूं है मेरा