आंसू टपकता ही नहीं दिखाई क्या देगा
दर्द भी ऐसे-जेहन में रम चुके हैं
सूखे आंसू भी गालों पर जम चुके हैं
मैंने सोचा-खिलेगी-महकेगी लाल गुलाब की तरह
मगर अनजान छुअन से सिमट गई वो छुईमुई
गीले पन्ने लिए इक रहस्यमयी किताब की तरह
ये पैसों की दौड़, आगे निकलने की होड़
पीछे आई छोड़, सपनों और सोच का गठजोड़
क्यों यह समंदर उठा है चांद निगलने को
मगर हारकर डूब गया अपने ही भीतर को
वो थी भागती-दौड़ती-हांफती जिंदगी के पक्ष में
मगर अब छोड़ भागना चाहती है बीच लक्ष्य में
अंतरद्वन्द्व की सिसकियां भरती है अनजाने में
मां सी दोस्त को डरती है बताने में
अब उसे इत्तेफाक नहीं बालों को सुलझाने में
क्योंकि अभी उलझी है वक्त को सुलझाने में
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