Friday, 26 September 2008

मेरी मां...

दिनभर दौड़े-भागे, चौका-चूल्हा संभाले,

पसीने से तर नजर आती मेरी मां

मेरी सलीके से भरी आवारगी पर,

सबकुछ जान कर भी मुस्कराती मेरी मां

जलता हूं जब भी अपनेआप में,

मेरे आंसू अपनी आंखों से बहाती मेरी मां

किताबों में जहां, कहां दिखता है,

अनुभव के चश्मे से दुनिया दिखाती मेरी मां

अंगुली पकड़कर चलना सीखा था वालिद की,

समाज के साथ चलना सिखाती मेरी मां

सीखता रहूं ताउम्र उन्हीं से मैं,

मेरे जीने का आखिरी बहाना मेरी मां

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