सहाफियों का भी है अपना मुक्कमल जहां,हरइक कलम की अदा जुदा सी है।
`कुछ´ शब्द बेचकर बनवाते हैं बेबसों से मकान,
तो कुछ ने शब्दों में ही जिंदगी तराशी है।
पेशेवर `कातिल´ कहो-तो क्या गलत होगा?
हथियार हमारे कलम और शब्द हस्सासी है।
बेदर्द शहर की दास्तां कहती खामोश बस्तियां,
यहां आने वाली हर आदम-रूह प्यासी है।
चुप्पी लिए चलती है बेखौफ `लाशें´ यहां,
जिंदा रहकर भी जीना एक अय्याशी है।
सहाफी-पत्रकार
हस्सासी-भावुकता
जिंदा रहना भी एक अय्याशी है-जा़हिदा हिना
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