Friday, 26 September 2008

...कोई...

मालूम नहीं दिल बेचैन क्यूं है मेरा
शायद राह में फिर टकरा गया कोई
पढ़ता रहा उसके अनकहे शब्दों को मैं
खामोश निगाहों से आवाज लगा गया कोई
इक पल के लिए यूं लगा मुझे
`नि:शब्द´ को खुद से मिला गया कोई
देखता रहा पिछले पायदान पर खड़ा मैं
दूर से ही हाथ हिला गया कोई
दिया कुछ भी नहीं था उसे मैंने
जाते-जाते मीठी मुस्कान लौटा गया कोई

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