Friday, 26 September 2008

एक परिन्दा

एक परिन्दा उड़ रहा है,
अनचाही दिशा में मुड़ रहा है
दिशाहीन उड़ान का उसे भान है
मगर हवा के हाथों में उसकी कमान है
अकस्मात ही वो प्रतिकूल धाराओं से लड़ा है
अपने पंखों का अस्तित्व बचाने को अड़ा है
तिनका लिए चोंच में घोसला बनाना चाहता है `वो´
अपने होने की औकात सबको बताना चाहता है `वो´
साथियों ने कहा उसे प्रतिकूलता की ये सनक छोड़ दो
या हौसले की उड़ान से हवाओं का गुरूर तोड़ दो
उस परिन्दे की मानिन्द शायद उड़ रहा हूं मैं भी
अनचाही दिशा की ओर मुड़ रहा हूं मैं भी
एक परिन्दा उड़ रहा है,
अनचाही दिशा की ओर मुड़ रहा है

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