Thursday, 15 January 2009

विडंबना

तरुण शर्मा 'नि:शब्द'
बेबाकी से बोलते शहर की ये खामोश बस्ती है
सारा शहर गुजरता है यहां से नाक पर रूमाल तानकर
अनदेखा कर देता है आंखों का सारा हाल जानकर
कचरे की वादियों के `हिल स्टेशन´ में एक अबोध गुडि़या बसती है,
घूमती है बैरंग चिट्ठी की तरह, खुद में ही हंसती है।
मजबूर ममता ख्वाबों के पालने में ही उसे झूलाती है,
जीवन के जीवंत सच की लोरियां ही गाकर सुनाती है।
थोड़े से थोड़ा बेहतर की फिराक में मां झाड़ू-पोंछा करती है,
अनसुलझे सवालों के जवाब में हरदम किस्मत का दम भरती है।
अंजस भावनाएं उसकी, किस्मत मिलती है इन चमकदार बाजारों में,
या फिर सौरमंडल के चमकते उन रोशन चांद-सितारों में।
आज वक्त ने इन अशक्त आंखों में दुल्हन का ख्वाब सजाया है,
मगर विडंबना, ससुराल भी ऐसी ही इक खामोश बस्ती में आया है।
बेबाकी से बोलते शहर की ये खामोश बस्ती है।